चेतना जागरण का वैश्विक संदेश
आज का समाज तीव्र प्रवाह में एक ही दिशा में बह रहा है—सत्ता, वैभव और संपदा की ओर। सफलता का अर्थ सत्ता, शीर्ष नौकरशाही, बाहुबल अथवा नामी व्यापारिक पहचान बन गया है। इस प्रवाह में विवेक, करुणा और धर्मबोध क्षीण होता जा रहा है।
तकनीक बढ़ी है, व्यवस्थाएँ ऑनलाइन हुई हैं, पर भ्रष्टाचार घटा नहीं—बढ़ा है। क्योंकि परिवर्तन बाहर हुआ है, भीतर नहीं।
समाज को दिशा केवल वही दे सकता है जिसके भीतर मानसिक और आत्मिक परिवर्तन घटित हुआ हो।
विचार, वेदना और वेद:
१.विचार यूँ ही उत्पन्न नहीं होते। उनके पीछे वेदना होती है।
२.वेद उसी वेदना से जन्मे—वे विशुद्ध विचारों का संकलन हैं।
३.धर्म भी वेदना से ही प्राणवान होता है।
४.जिसमें वेदना नहीं, वह धार्मिक नहीं हो सकता।
वेदना से विचार जन्म लेता है, चिंतन–मनन होता है, सत्य–असत्य का मंथन होता है और तब जीवन का मार्ग खोजा जाता है।
जब मनुष्य स्वयं अंधकार में होता है, तब वह विद्वानों और ज्ञानी जनों का आश्रय लेता है। वे वेद का संकेत करते हैं। वेद धर्म की ओर ले जाता है और धर्म से समाधान उत्पन्न होता है। यह एक शाश्वत प्रक्रिया है।
धर्म का विकृतिकरण :
१ जहाँ धर्म कृत्रिम धारणाओं में बदल जाए।
२.जहाँ परंपरा जड़ बन जाए,
वहाँ विचार उत्पन्न नहीं होते।
३.विचार चेतना में होते हैं, मूर्छा में नहीं।
४.मूर्छित मनुष्य भ्रम में रहता है, निर्णय नहीं ले पाता।
५. जहाँ सत्य नहीं, वहाँ न्याय नहीं।
६जहाँ न्याय नहीं, वहाँ धर्म नहीं।
और
७. जहाँ धर्म नहीं, वहाँ मनुष्य अन्याय को देखते हुए भी संवेदनहीन बना रहता है।
वह मान तो लेता है, पर स्वीकार कर कर्म में परिणत नहीं करता—
क्योंकि , वह मूर्छित है।
संज्ञा , मूर्छा और जड़ता
१.संज्ञाहीन समाज कभी नहीं सुधरता।
२.जहाँ जड़ता है, वहाँ चेतना का प्रवाह नहीं होता।
३. चेतना जड़ को हिला सकती है, बदल सकती है, नष्ट भी कर सकती है।
४. मूर्छित को जगाया जा सकता है,
पर जड़ को नहीं—उसे हटाना पड़ता है।
यही कठोर सत्य है।
सज्जन और परिवर्तन
सज्जन वही है—
१. जो चेतन है,
२.जिसकी संज्ञा जाग चुकी है,
३.जिसने संकल्प लिया है।
वह कृत्रिम उपाय नहीं खोजता।
वह स्वयं परिवर्तन बनता है।
४ सज्जन (चेतन पुरुष) के
जब शब्द चेतना से जन्म लेकर रूप धारण करता है, तो वह हृदय, मन और मस्तिष्क को झकझोर देता है।
कुछ मूर्छित ही जागते हैं। सब नहीं।
फिर लोगों की “देखा–देखी” आरंभ होती है—
पूर्ण जागरुकता नहीं, पर अर्ध–मूर्छा टूटती है।
यहीं से समाज बदलता है।
वैश्विक आह्वान :
विश्व धर्म संघम समस्त मानवता से आह्वान करता है:
यदि जाग सकते हो, तो जागो।
जड़ कभी नहीं जागता।
मूर्छित हिलता है, पर देर से संभलता है।
उसे बार–बार चेतना की थपकी देनी पड़ती है।
*चेतना ही धर्म है।
*चेतना ही न्याय है।
*चेतना ही मानवता का भविष्य है।
विश्व धर्म संघम – वैचारिक उद्घोष:
हम, विश्व धर्म संघम के सदस्य और अनुयायी जन
इस सत्य को स्वीकार करते हैं कि आज मानव समाज सत्ता, वैभव और संपदा के एकांगी प्रवाह में बह रहा है; कि तकनीकी प्रगति के बावजूद चेतना का ह्रास और भ्रष्टाचार का विस्तार हो रहा है; और कि बाहरी व्यवस्था का परिवर्तन आंतरिक मनुष्य के परिवर्तन के बिना निरर्थक है।
हम यह घोषित करते हैं कि विचार का जन्म वेदना से होता है, वेद विशुद्ध विचारों का संकलन हैं, और धर्म वेदना से ही प्राणवान होता है।
हम यह मानते हैं कि जहाँ सत्य नहीं, वहाँ न्याय नहीं; जहाँ न्याय नहीं, वहाँ धर्म नहीं; और जहाँ धर्म नहीं, वहाँ समाज संज्ञाहीन होकर अन्याय को सहता रहता है।
हम यह स्वीकार करते हैं कि मूर्छित को जगाया जा सकता है, पर जड़ता को नहीं—उसे हटाना ही पड़ता है।
अतः हम यह वैचारिक उद्घोष करते हैं कि—
१.हम चेतना को जाग्रत करेंगे,
२.धर्म को कृत्रिमता से मुक्त करेंगे,
३.विचार को वेदना से जोड़ेंगे,
और
४.समाज में सत्य, न्याय एवं धर्म की स्थापना हेतु सतत कार्य करेंगे।
५.हम मूर्छित को जगाने का प्रयत्न करेंगे,
६. मानवीय जड़ बौद्धिकता का प्रतिकार करेंगे,
और
७. सज्जन चेतना को सामाजिक शक्ति बनायेंगे।
इसी उद्देश्य से, मानवता के नैतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण हेतु, हम इस वैचारिक उद्घोष को स्वीकार करते हैं।
ॐ इति।
🙏✍️🔦💡📢
स्वामी सौम्या नन्द जी पुरी।


