विज़न


सामाजिक पुनरोत्थान:
वर्तमान में सम्पूर्ण मानव जीवन वैश्विक साझेदारी में है। उसका प्रत्येक कार्य सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करता है। इतिहासिक अध्ययन के साथ वर्तमान में स्थितियों में सुधार किया जाना आवश्यक है। विश्व में आज युद्ध और अशांति का मुख्य कारक धर्म का ठीक से व्याख्यायित न होना है। अज्ञानता ही प्रमुख कारण है। मानसिक और चैतिसिक अध्ययन के साथ बोध गम्य शिक्षण व्यवस्था नहीं होने से चित्त में बसे संस्कारों का विशुद्धिकरण नहीं हो रहा है। धर्म का बोध होने से मानव में सद्गुणों का प्रकाश होता है। शिक्षा में अभुत पूर्व बदलाव से शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास होगा। और सभी धर्म समूह और भाषाओं के अध्ययन से शिक्षा के स्तर पर बहुत बड़े बदलाव होंगे। जो इस प्रकार होंगे।
- भारत वैश्विक स्तर पर ज्ञान विज्ञान के साथ अपनी पुरातन विद्या के साथ वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को पुनः साकार कर सकेगा । जिससे पारस्परिक भेद – भाव भी समाप्त होंगे।
- विश्व धर्म आध्यात्मिक शोध एवम् अनुवीक्षण संस्थान विश्व विद्यालय की स्थापना से शिक्षण और शोध से चिकित्सा जगत में एक क्रांति आएगी।
- शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता बढ़ेगी।
- रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी।
- पर्यटन विकसित होगा।
- युद्धों पर विराम लग सकेगा।
- न्यायिक व्यवस्था में अमूलचूल परिवर्तन होगा।
- सामाजिक दृष्टिकोण बदलने से पारस्परिक विषमताएं मिटेंगी।
- जीनी स्तर पर मानवीय विकास
- गुणांक में वृद्धि होगी । तथा जीनी विकृतियों का विशुद्धिकरण होगा।
- राष्ट्रों में अपव्यय न्यून हो जायेंगे । जिससे राष्ट्रीय आय में वृद्धि होकर राष्ट्र कोश बढ़ेगा।
- आत्म अवलोकन होने से मानवीय श्रम की गुणवत्ता वृद्धि होगी।
- धर्म और अध्यात्म का वैश्विक स्तर पर होने से भारत की गरिमा बढ़ेगी । और विश्व में पारस्परिक मैत्री पूर्ण संबंध एक दूसरे के साथ होने से वैश्विकता के साथ – साथ मानवीयता विकसित होगी । जो दैवीय गुणों को प्राप्त कर उच्चतम विकास की ओर अग्रसर होगी । जिसे हम उच्च लोक स्वर्ग आदि की बाते करते हैं । वह इसी पृथ्वी पर हम अनुभव में ले सकेंगे।
धर्मों का समन्वय एवम् वैश्विकता की स्थापना :
धर्म व्यापक है ईश्वरीय या प्रकृति के सभी व्यवहार एक जैसे होते हैं। धर्म भी समस्त मानव का एक ही है। विश्व अर्थात ईश्वर के द्वारा स्थापित धर्म ही विश्व धर्म है । विश्व धर्म की पुनर्जागृति करना और सभी प्रचलित धर्मों पंथों का समन्वित एकीकरण कर मानवता और प्रकृति की सेवा करना है। धर्म प्रणेताओं ने एक ही बात को अपनी अपनी भाषाओं में कहा है। सभ्यताओं के अंतर से जीवन शैली भिन्न रही है भाषाओं की भिन्नता से पारस्परिक समझ का अभाव होना स्वाभाविक है। देश काल और वातावरणीय स्थियों में जीवन की आवश्यकताएं भिन्न होती हैं । तब बाहरी जीवन शैली में परिवर्तन स्वाभाविक है । लेकिन चेतना के स्तर पर मूल दर्शन एक ही है। मानवीय वृत्ति में ही नहीं जीव वृत्तियों में जो भी विकसित हैं उनमें नेतृत्व की भावनाएं भी होती हैं । मानव में भी ये वृत्ति अत्यंत विकसित होकर सत्ता के रूप में बदल गई जिससे राज्य व्यवस्थाओं का जन्म हुआ। धर्म और आध्यात्मिक शोध होने से धर्मों का समन्वय होगा और मूल वैश्विक धर्म विकसित होगा जिसकी सभी धर्म समुदाय करते हैं । युद्ध लड़कर किसी को एक नहीं किया जा सकता। लेकिन विद्या और ज्ञान के आधार पर हम सब एक हो सकते हैं। आज अनेक क्षेत्रों में हम सब एक जैसा ही उपभोग और उपलब्धि कर रहें हैं। सारे विश्व में कोई भी मानव ऐसा नहीं है जिसमें प्राकृतिक भिन्नता हो। जीनी भिन्नताओं की बात यहां नहीं हैं । यहां शारीरिक मानसिक चित्त चैतीसिक गुण धर्म की बात है। धर्मों के समन्वय से जीवन शैली वैश्विक होगी पारस्परिक संबंधों से ईश्वरीय शक्तियां हमें अनुग्रहित कर सुख समृद्धि प्रदान करती हैं जिसकी हम सभी लोग कामनाएं करते हैं।
दिव्य विश्व परिवार- Divine World Family:
हमारा सम्बंधित संगठन “विश्व धर्म संघम” का संबंधित संघठन वैश्विक दिव्य परिवार-Divine World Family है। जो भी व्यक्ति धर्म और आध्यात्मिक शोध से स्व चेतना से चित्त की विकारों से निवृत्ति होकर विशुद्ध हो गया हो उसे इस परिवार की सदस्यता मिल सकेगी। शोधार्थी व्यक्ति भी इस परिवार के सदस्य होंगे। जिन्हें Divine World Family के द्वारा स्थापित समस्त नियमों का पालन अनिवार्य है।
हमारी धारणा:
हमारा सम्बंधित संगठन “विश्व धर्म संघम” का संबंधित संघठन वैश्विक दिव्य परिवार-Divine World Family है। जो भी व्यक्ति धर्म और आध्यात्मिक शोध से स्व चेतना से चित्त की विकारों से निवृत्ति होकर विशुद्ध हो गया हो उसे इस परिवार की सदस्यता मिल सकेगी। शोधार्थी व्यक्ति भी इस परिवार के सदस्य होंगे। जिन्हें Divine World Family के द्वारा स्थापित समस्त नियमों का पालन अनिवार्य है।






