मिशन

विश्व धर्म संघम का उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व के मानव जीवन को उनके उच्चतम मूल्यों के विकास हेतु कार्य बिना किसी भेद भाव किया जाना है। मानव के समस्त व्यवहारिक ज्ञान भौतिक जगत के संपर्क से उत्पन्न जिज्ञासाओं के आधार पर होते है । जब भी शरीर पर कोई स्पर्श होता है। तो हमारी ज्ञानेंद्रिय तंत्र जाग उठते हैं। संवेदना के प्राप्त होते ही संज्ञा तंत्र स्पर्श का परिचय प्राप्त करता है । यदि पूर्व से कोई स्पर्श समान रूप से वैसा ही है या भिन्न प्रकार का है इसका आकलन संज्ञा तंत्र करता है। हमारे मस्तिष्क के विभिन्न भाग विभिन्न अंगों और इन्द्रियों के स्पर्श को अलग – अलग रूप से आकलन करते हैं। आकलन के बाद अच्छा या बुरा जैसी या फिर न अच्छा और न बुरा, उदासीन प्रतिक्रियाएं होती हैं। अच्छा लगने पर भी प्रतिक्रिया होती हैं और बुरा लगने पर भी प्रतिक्रियायें होती हैं । किसी वस्तु के स्पर्श मात्र से उस वस्तु की जिज्ञासा प्राप्ति की ओर मन जाता है। और यदि स्पर्श बुरा लगा तो दूरी बनाने या दूर करने जैसी प्रतिक्रिया होती है। जिसे द्वेष भी कहते हैं। अच्छे लगने की प्रतिक्रिया को राग कहा जाता है । इस राग और द्वेष दोनो अवस्था में संस्कार बनते हैं। अच्छे संस्कार या फिर बुरे संस्कार । प्राप्ति की इच्छा या द्वेष की प्रतिक्रिया से कर्म का संकल्प लिया जाने और यदि तत्काल कर्म की प्रवृत्ति बन जाती है, या इसे आगे भविष्य में पूरा करने के लिए छोड़ दिया, लेकिन यदि संस्कार बनाया गया है, तो वह बना हुआ संस्कार चित्त में अपने एक निश्चित कोश में संग्रहित होता है। ये संस्कार की वृत्तियां बनकर विचार में परिणिति होते हैं। ये विचार पुनः मानस के पटल पर आते हैं तो ये विचार उधेड़बुन अर्थात आकलन करते हैं। वे याद दिलाते हैं कर्म में परिणिति के लिए। लेकिन जब कोई संस्कार बहुत दिनो तक कर्म में नहीं बदला गया और अन्य संस्कारों की आवृत्तियां चित्त में बसती जाती हैं। तब वे संस्कार संग्रहित होते रहते हैं एक ही संस्कार गहरे तल पर जाकर चित्त में बस जाता है उनकी परते घनी हो जाती हैं । तब पूर्व के संस्कार बाहर नहीं आ पाते। या कभी कभार आते भी हैं तो भी यदि कर्म की स्थिति नहीं बनती तब, ये संस्कार यदि कर्म में प्रवृत्ति नहीं हुए तब ये प्रारब्ध संस्कार बन जाते हैं। प्रारब्ध बनकर चित्त में संग्रहित होते हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऊर्जा जो चेतना और पदार्थों के ऊर्जा के साथ एक बंधन बनाकर ही जीव रूप में होता है। चित्त चेतन हैं। और इस चेतना के साथ जो भी जीव संस्कार बनाता है वे संस्कार सूक्ष्म परा भौतिक होते हैं जो चेतना में ही लिपटे हुए या संलग्न हो जाते हैं। दूसरे जन्म में ये संस्कार प्रारब्ध बन कर साथ जाते हैं। इन संस्कारों से मुक्ति का ज्ञान और विज्ञान ही वास्तविक धर्म कहलाता है । वास्तव में निर्वाण या मुक्ति जीवन में जो भी चित्त में संस्कार किसी भी रूप में हैं या जीनी स्तर पर पूर्वजों से प्राप्त शरीर के माध्यम से आते हैं ।उन सभी संस्कारों से मुक्त हुआ निर्मल चित्त ही मुक्ति कहा गया है।

धर्म क्या?:

विज्ञान की भाषा में धर्म वह है जो हर जीव में उसके गुणों में प्रकट होता है। विज्ञान की भाषा में हर परमाणु का अपना व्यवहारिक गुण होता है। जो भी वह क्रियात्मक रूप से प्रकट करता है । वह गुण धर्म कहलाता है क्योंकि उसने जो धारण किया है वह गुणों में वर्तता है। इसलिए धर्म वह है ।जो हर कण, हर निकाय का अपना व्यवहारिक गुण प्रकट अप्रकट है, धर्म कहलाता है। धर्म का वास्तविक अर्थ समय के परिवर्तन से बदलता गया । इसका उपयोग संस्कार की विशुद्धि से लेकर सामाजिक विशुद्घि में होने लगा । फिर यह समुदायों की पहचान बन गया। मानव का वास्तविक धर्म क्या ? इसमें आज एक प्रश्न वाचक चिन्ह लग गया है। हर धार्मिक समुदाय में धर्म को लेकर भ्रांतियां हैं। इन भ्रांतियों को दूर करना हमारा लक्ष्य है। धार्मिक भ्रम के कारण हजारों ऐसी धारणाएं हैं जो कल्पित हैं । और ये धारणाएं ही विश्व में सर्वाधिक अशांति का कारण हैं। और युद्ध जैसी स्थितियों को उत्पन्न करती रहती हैं। जबकि ये धारणाएं चित्त की वृत्तियों द्वारा बने संस्कारों का परिणाम है। धर्म से इन धारणाओं का कोई संबंध नहीं है। मानवीय समाज में वर्तमान में कोई अध्ययन यदि इस विषय पर है तो वह मनोविज्ञान की शाखा में है । लेकिन वास्तविकता से बहुत दूर है। विश्व धर्म संघम इस कार्य पर सतत आगे बढ़ रहा है।

शिक्षा, विद्या और धर्म जागृति:

धर्म का वास्तविक बोध ही हमारा उद्देश्य है। इसके लिए संघठन द्वारा “विश्व धर्म आध्यात्मिक शोध एवम् अनुवीक्षण संस्थान विश्व विद्यालय” की स्थापना विश्व स्तर पर किया जाना है। जिसके लिए प्रस्ताव पारित होने के बाद जन जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। भूमि भवन के लिए राज्य सरकारों के साथ जन संपर्क किए जा रहे हैं।

धार्मिक एवम् सांस्कृतिक कार्य:

विश्व धर्म संघम द्वारा जन जागरण एवम् सामाजिक समरसता हेतु धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यों का किया जाना उद्देश्य है। सभी धर्मों पंथों में कुछ न कुछ मानवीय जीवन शैली का समावेश है। ये जीवन शैली सामूहिक एकता को बढ़ावा देती है। विभिन्न प्रकार के त्योहार उत्साह वर्धन करते हैं तो पारस्परिक विकृतियों को दूर करने की एक पहल भी यहां दिखती है। सीखने का ज्ञान वर्धन होता है। प्रेरणा मिलती है। लेकिन सांस्कृतिक कार्यों में जड़ता, मान्यताओं, और धारणाओं की प्रबलता से अंधविश्वास भी बढ़ता है। धार्मिक कट्टरता में भी वृद्धि होती है। मैं और मेरा जब सामूहिक वृत्ति बनती है तो वहां पर अन्य जीवन शैली और संस्कृतियों का पारस्परिक द्वंद उत्पन्न होता है। हमारा उद्देश्य मानवीय अंतर्द्वंद समाप्त करना है। इसके लिए हर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वैश्विक स्तर पर अज्ञानता के समस्त कारणों को समाप्त किया जाना है। जिसके लिए मार्ग दर्शन आवश्यक है। मानसिक जड़ता और बौद्धिक जड़त्व समाज को द्वंद में डालता है। सत्संग के द्वारा ही जिसे समन्वित किया जा सकता है। इस हेतु सत्संगों का आयोजन उत्सवों के साथ एक उत्तम व्यवस्था को जोड़ने का हमारा प्रयास होगा।

सतसंगत और दीक्षा :

एक प्रमुख व्यवस्था है जहां सामाजिक विकृतियां समाप्त की जाती रही है। बिना किसी मानसिक और शारीरिक बाहरी दबाव के स्वत: सहज उत्तम व्यवस्थाओं को स्वीकार्यता हो जाय और उसके परिणाम जिससे पारस्परिक प्रेम सौहार्दता उत्पन्न होता है । तथा त्याग ही सामाजिक एकता प्रेम की धुरी है। नश्वरता और परिवर्तन इस संसार का नियम है हर क्षण बदलाव के सिद्धांत का बोध अंतःकरण की स्वीकार्यता हो जाना आवश्यक है। जिससे मानवीय जीवन में अनेक विकृतियों का समन्वय सहज हो जाता है। आसक्ति ही व्यक्ति में अनेक द्वंद और विकार उत्पन्न करते हैं। सत्य का बोध और नश्वरता का बोध कराने के लिए सत्संग और दीक्षा संस्कार के साथ साधना उपासना सत्संग प्राथमिक पहलू हैं। विद्यालयी व्यवस्थाओं में लागू करना हमारा उद्देश्य है। जिनके बिना अंतर्बोध संभव नहीं है। अंतरबिध से ही मानवीय जीवन में परिवर्तन आकार दिव्यता प्राप्त होती है।

पूजा एवम् उपासना:

विश्व के कई धर्मों में पूजा करने की पद्धतियां हैं। भारत में मूर्ति पूजा की विशिष्टता है। देव स्थलों में प्रार्थना पूजा जाप और पाठ आदि किए जाने की परंपरा है। विश्व धर्म संघम किसी विशेष पूजा पाठ आदि की वैज्ञानिकता पर विशेष अध्ययन और शोध ही हमारा उद्देश्य है। देवताओं गुरुजनों एवम् माता पिता तथा विशिष्ट रूप से पवित्र नदियों स्थानों वृक्षों तथा गाय और विशेष जीवों की पूजा का श्रद्धालु भक्त जन करते आ रहे हैं। पूजा के साथ मंत्रों का जाप आदि किए जाते हैं। तंत्र और मंत्र विज्ञान पर हमारा दृष्टिकोण शोध का है। जिससे वैज्ञानिक स्तर पर तंत्र और मंत्रों की स्थिति स्पष्ट हो सके। इनकी वास्तविकता या काल्पनिकता का स्पष्टीकरण आवश्यक है ताकि भ्रम समाप्त हो। सम्पूर्ण दुनिया में समस्त धार्मिक जगत में किसी न किसी मंत्र का जाप करते दिखते हैं। माला हर एक के हाथ में दिखता है। तब यहां मंत्र विज्ञान क्या? इससे क्या वास्तविक रूप में प्रभाव पड़ते हैं। कई बार लोग वर्षों तक जाप करते हैं लेकिन उनके जीवन में कोई प्रभाव परिणाम में नहीं दिखता। इसलिए यह शोध का विषय है। जीवन का एक अमूल्य समय व्यक्ति जप आदि कर्मों में लगा देता है ।जिससे जीवन का अमूल्य समय उनके हाथ से चला जाता है।

ध्यान:

ध्यान का मुख्य उद्देश्य समाज में शांति प्राप्ति के लिए किया जाता है। तो धार्मिक जगत में ईश्वर या मुक्ति प्राप्ति का साधन विधि कहा गया है। ध्यान की अनेक पद्धतियां विश्व में प्रचलित हैं। जिनको पुन: शोध कर विशुद्ध प्रस्तुति तैयार करना है। ध्यान एक खोज, ध्यान एक क्रिया है। और बड़ी वैज्ञानिक क्रिया है। इसे साधना की एक पद्धति भी कह सकते हैं। योग साधनाओं में ध्यान एक महत्व पूर्ण अंग है। पतंजलि के योग दर्शन में ध्यान को विशेष रूप से समझाया गया है। ध्यान को सभी धर्मों ने स्वीकार किया है। लेकिन ध्यान किसका यह जानना आवश्यक है। वैज्ञानिक समस्त खोजो में ध्यान की प्रक्रिया से ही आज हम विकास कर सके हैं, तो एक योगी भी ध्यान से ही ईश्वर को जान लेता है या उसका दर्शन बोध प्राप्त करता है। संस्था द्वारा मोक्ष प्राप्ति में ही नहीं बल्कि जीवन के हर कार्य व्यवहार में ध्यान के महत्व को प्रतिपादित करने शोध करने की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित किया है। हम इसके लिए विश्व धर्म आध्यात्मिक शोध एवम् अनुवीक्षण संस्थान विश्व विद्यालय की स्थापना एवम विद्या अध्ययन के बाद भी जीवन के हर कार्य व्यवहार सामाजिक सांस्कृतिक और सत्संग के मंचों पर विद्या के प्रचार प्रसार म जोर देते रहेंगे।

सामूहिक भोजन वितरण:

समय समय पर विशिष्ट आयोजनों के साथ भंडारा सह भोज हमारा उद्देश्य है जिसे हम करते आ रहे हैं। भविष्य में जन सहयोग के आधार पर नियमित भंडारा प्रसाद की व्यवस्था भूंखे को भोजन के रूप में किए जाने का प्रस्ताव है। जिसे समय समय पर संघ द्वारा किया जाता रहा है।और आगे भी किया जाता रहेगा।

विश्व धर्म संघम की स्थापना 15 अक्टूबर 2019 को  अहेतु की प्रेरणा से श्री चंद्र कान्त भारद्वाज ( पूर्व नाम ), संत स्वामी सौम्या नन्द जी महाराज के द्वारा एवम् उनके शिष्यो की प्रार्थना पर संत श्री मेधा नंद जी महाराज और अन्य के साथ लखनऊ में न्यास के रूप में पंजीकृत कराकर किया गया है। जिसमें विभिन्न बिंदुओं पर विचारों में प्राप्त तथ्यों को समावेश पंजीयन में किया गया है। जो यहां प्रस्तुत हैं। विश्व धर्म संघम न्यास का पंजीयन संख्या 223/2019/lko है ।

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